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सिद्धारमैया का इस्तीफा ,अब डीके होंगे कर्नाटक के नए सीएम,कैसे आखिरकार तीन साल बाद लागू हुआ कांग्रेस का ढाई-ढाई साल फॉर्मूला

अबतक इंडिया न्यूज 28 मई । कर्नाटक में आखिरकार वह राजनीतिक पटकथा पूरी हो गई जिसकी चर्चा पिछले डेढ़ साल से सत्ता और संगठन के गलियारों में चल रही थी। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जो कांग्रेस न कर सकी वह कर्नाटक में किया। सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार को लाकर कांग्रेस ने 2023 में सत्ता में आने के समय बना ढाई-ढाई साल का अनौपचारिक फॉर्मूला लागू कर दिया।

2023: जीत के बाद पहली खींचतान

मई 2023 में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। एक तरफ सिद्धारमैया थे  बड़े जनाधार वाले ओबीसी चेहरा , प्रशासनिक अनुभव और कल्याणकारी राजनीति की पहचान। दूसरी तरफ डीके शिवकुमार थे जो संगठन के संकटमोचक, जिन्होंने पार्टी टूटने नहीं दी, फंडिंग से लेकर रणनीति तक सब संभाला और चुनावी मशीनरी खड़ी की।

दिल्ली में कई दौर की बैठकों के बाद कांग्रेस नेतृत्व किसी एक पक्ष को पूरी तरह नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। तभी सत्ता-साझेदारी का फार्मूला तैयार हुआ। आधिकारिक तौर पर कभी इसकी पुष्टि नहीं हुई, लेकिन पार्टी के भीतर यह लगभग तय माना गया कि पहले ढाई साल सिद्धारमैया और बाद के ढाई साल डीके शिवकुमार सरकार चलाएंगे।

नवंबर 2025: पहली बार खुलकर सामने आया विवाद

20 नवंबर 2025 को सरकार के ढाई साल पूरे होते ही बेंगलुरु से लेकर दिल्ली तक हलचल शुरू हो गई। डीके समर्थक विधायक दिल्ली पहुंचने लगे। यह संदेश दिया जाने लगा कि अब समझौते का दूसरा हिस्सा लागू होना चाहिए। लेकिन सिद्धारमैया पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि ऐसा कोई ढाई साल का समझौता नहीं है। मैं पांच साल सरकार चलाऊंगा। इस बयान ने साफ कर दिया कि सत्ता परिवर्तन आसान नहीं होगा।

इसके बाद कई महीनों तक कांग्रेस नेतृत्व ने मामला टालने की रणनीति अपनाई। वजह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं थी, बल्कि सामाजिक संतुलन  भी था। पार्टी को डर था कि अगर सिद्धारमैया को अचानक हटाया गया तो ओबीसी वर्ग में गलत संदेश जा सकता है।

दिल्ली में डीके खेमे की लॉबिंग

इसी दौरान डीके शिवकुमार खेमे ने दिल्ली में लगातार दबाव बनाए रखा। पार्टी के भीतर यह तर्क दिया गया कि जब कांग्रेस सबसे कमजोर दौर में थी तब डीके ने ही संगठन को संभाला। एजेंसियों के दबाव और राजनीतिक संकट के बावजूद वे पार्टी के साथ खड़े रहे।

सूत्र बताते हैं कि प्रियंका गांधी भी लगातार यह राय रख रही थीं कि पार्टी को उन नेताओं का साथ देना चाहिए जो मुश्किल समय में भी संगठन नहीं छोड़ते। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी भी सत्ता परिवर्तन के पक्ष में माने जा रहे थे।

26 मई: दिल्ली बुलावे ने बदल दिया पूरा खेल

  • 26 मई 2026 को अचानक सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों को दिल्ली बुलाया गया। आधिकारिक बयान आया कि बैठक राज्यसभा चुनाव को लेकर है, लेकिन कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में जो घटनाक्रम हुआ उसने साफ कर दिया कि असली एजेंडा कर्नाटक की सत्ता है।
  • शुरुआत में खरगे, राहुल गांधी और पार्टी महासचिव रणदीप सुरजेवाला और केसी वेणुगोपाल की मौजूदगी में बैठक हुई, लेकिन दोनों कर्नाटक नेताओं को बाहर इंतजार कराया गया। इसके बाद पांचवीं मंजिल पर राहुल गांधी और सिद्धारमैया की वन-टू-वन बैठक हुई।
  • यहीं सत्ता परिवर्तन का अंतिम फैसला हुआ। सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने सिद्धारमैया से कहा कि पार्टी अब ट्रांजिशन चाहती है और उन्हें सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ना चाहिए। उन्हें राज्यसभा और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका का विकल्प भी दिया गया।

सिद्धारमैया की आखिरी कोशिश और हाईकमान का संदेश

  • सूत्र बताते हैं कि सिद्धारमैया ने शुरुआत में यह दलील दी कि उनकी सरकार की योजनाएं लोकप्रिय हैं और नेतृत्व परिवर्तन से राजनीतिक संदेश गलत जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अभी भी विधायकों के बीच मजबूत समर्थन रखते हैं।
  • लेकिन हाईकमान का संदेश साफ था अगर समझौता लागू नहीं हुआ तो इससे पार्टी नेतृत्व की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे। साथ ही डीके समर्थक खेमे में असंतोष बढ़ने का खतरा था।
  • कांग्रेस नेतृत्व नहीं चाहता था कि मामला खुली बगावत में बदले। इसलिए पूरी प्रक्रिया को सहमति आधारित बदलाव की तरह डिजाइन किया गया।

बेंगलुरु लौटते ही साफ हो गया फैसला

दिल्ली से लौटने के बाद सिद्धारमैया ने पहले चुप्पी बनाए रखी। लेकिन बेंगलुरु में विधायकों और मंत्रियों के साथ हुई ब्रेकफास्ट बैठक में उन्होंने साफ संकेत दे दिए कि वे इस्तीफा देंगे। इसके बाद घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ा और आखिरकार उन्होंने पद छोड़ दिया।

अब डीके के सामने क्या चुनौती?

डीके शिवकुमार के लिए यह सिर्फ व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक परीक्षा भी है। उन्हें संगठन और सरकार दोनों को संतुलित करना होगा। सबसे बड़ी चुनौती सिद्धारमैया खेमे को साथ रखना होगी, क्योंकि पार्टी नहीं चाहती कि सत्ता परिवर्तन से अंदरूनी दरार खुलकर सामने आए।

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