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बंगाल के बाद दिल्ली में भी टूट गई TMC… 20 सांसदों ने बनाया अलग गुट, एनडीए को समर्थन का ऐलान

अबतक इंडिया न्यूज 8 जून । राजनीति मे कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता । जिस पार्टी को ममता बनर्जी ने अपने दम पर खड़ा किया, उसी पार्टी के भीतर अब बगावत की आग खुलकर सामने आ गई है. और इस बगावत का चेहरा बनी हैं काकोली घोष दस्तीदार. वही काकोली, जिन्हें कभी ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिना जाता था. अब वही ममता बनर्जी की नाक के नीचे से टीएमसी के 20 सांसद छीनकर ले गईं. उनकी अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए में शामिल होने की इच्छा जताई है.
ममता से र‍िश्ता चार दशक पुराना
दिलचस्प बात यह है कि काकोली घोष दस्तीदार कोई ऐसी नेता नहीं हैं जो अचानक राजनीति में आई हों. उनका और ममता बनर्जी का रिश्ता करीब चार दशक पुराना है. दोनों ने कांग्रेस की छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू किया था. उस दौर में जब ममता बनर्जी कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज में छात्र राजनीति का चेहरा बन रही थीं, तब काकोली घोष कोलकाता मेडिकल कॉलेज में सक्रिय थीं.

धीरे-धीरे दोनों के राजनीतिक रास्ते एक हो गए. 1984 में जब ममता बनर्जी ने दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में धमाकेदार एंट्री की, तब से काकोली भी उनके राजनीतिक सफर की अहम साथी बन गईं. यही वजह है कि आज की बगावत को सिर्फ राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि पुराने रिश्ते के टूटने के रूप में भी देखा जा रहा है.
पेशे से डॉक्‍टर, लेकिन सबसे मुखर
पेशे से डॉक्टर काकोली घोष दस्तीदार को तृणमूल कांग्रेस की सबसे वरिष्ठ महिला नेताओं में गिना जाता है. वह पार्टी की महिला इकाई ऑल इंडिया तृणमूल महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रही हैं. संसद में स्वास्थ्य, महिलाओं और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता अक्सर चर्चा में रही.
चार बार चुनी गईं सांसद
बारासात लोकसभा सीट से उन्होंने लगातार चार बार जीत दर्ज की. 2009, 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में उन्होंने अपनी सीट बचाकर यह साबित किया कि वह केवल संगठन की नेता नहीं, बल्कि जनता के बीच भी मजबूत पकड़ रखती हैं. पार्टी में उनका कद इतना बड़ा था कि उन्हें लोकसभा में टीएमसी संसदीय दल की उपनेता और बाद में चीफ व्हिप जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी दी गईं.
कहां से ब‍िगड़ा खेल
लेकिन राजनीति में रिश्ते जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से बदल भी जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदलता दिखाई दिया. कल्याण बनर्जी और महुआ मोइत्रा से जुड़े विवादों के बाद काकोली को चीफ व्हिप बनाया गया था. उस समय माना गया कि ममता बनर्जी ने उन पर अपना पूरा भरोसा जताया है. लेकिन हाल के घटनाक्रम में कल्याण बनर्जी की फिर से वापसी हुई और उन्हें दोबारा चीफ व्हिप बना दिया गया. शताब्दी रॉय उपनेता बनी रहीं और काकोली के पास संसदीय ढांचे में कोई औपचारिक पद नहीं बचा. राजनीतिक गलियारों में तभी से चर्चा शुरू हो गई थी कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है.
जब फेसबुक पोस्‍ट हुई वायरल
इसी दौरान काकोली घोष दस्तीदार की एक फेसबुक पोस्ट ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं. उन्होंने लिखा था, 1976 से जान-पहचान, 1984 से साथ चल रहे हैं. आज मुझे चार दशकों की वफादारी का इनाम मिला.यह एक छोटा सा वाक्य था, लेकिन राजनीति में ऐसे वाक्य अक्सर बड़े संदेश दे जाते हैं. उस समय कई लोगों ने इसे नाराजगी का संकेत माना था. हालांकि तब किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही दिनों बाद वही नाराजगी खुली बगावत का रूप ले लेगी. अब जब 20 सांसदों के साथ NDA में जाने की बात सामने आई है, तो उस पोस्ट का मतलब और भी स्पष्ट नजर आने लगा है.
जब आया नया मोड़
सोमवार को घटनाक्रम ने नया मोड़ तब लिया जब काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपा. काकोली का दावा है कि कम से कम 20 सांसद इस फैसले के साथ हैं. उन्होंने कहा कि यह कोई व्यक्तिगत फैसला नहीं है, बल्कि लंबे विचार-विमर्श और साथियों से चर्चा के बाद उठाया गया कदम है. उनका कहना है कि जनता ने जो जनादेश दिया है, उसे देखते हुए उन्हें लगता है कि उनकी भविष्य की राजनीतिक यात्रा NDA के साथ होनी चाहिए. यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे साफ संकेत मिलता है कि यह केवल संसदीय पद को लेकर नाराजगी नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा बदलने का फैसला भी हो सकता है.

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