अबतक इंडिया न्यूज 14 मई । केरल सीएम पर 10 दिनों से जारी सस्पेंस का पटाक्षेप हो गया. आखिरकार केरल को नया मुख्यमंत्री मिल गया. करीब 10 दिनों की माथापच्ची के बाद कांग्रेस ने आज यानी गुरुवार को केरल के नए सीएम का ऐलान कर दिया. वीडी सतीशन केरल के नए सीएम बने हैं. कांग्रेस ने केसी वेणुगोपाल की जगह वीडी सतीशन पर ही भरोसा जताया है. कांग्रेस विधायक दल की बैठक में करीब 50 विधायकों के समर्थन के बावजूद वेणुगोपाल अपने पुराने प्रतिद्वंदी वीडी सतीशन से हार गए. अब सवाल है कि आखिर केसी वेणुगोपाल कैसे हार गए? कहां पर वीडी सतीशन उन पर भारी पड़ गए? ये कैसे हुआ कि राहुल गांधी ने अपने सबसे करीबी को ही बहुमत के बावजूद सीएम की कुर्सी से महरूम कर दिया?
आइए आपको बताते हैं कि कैसे सतीशन ने वेणुगोपाल को कम विधायकों के समर्थन के बावजूद हरा दिया. कैसे वीडी सतीशन ने वेणुगोपाल के जबड़े से सीएम की कुर्सी छीन ली? एक-एक करके पांच कारण समझते हैं.

पहला कारण- सतीशन की सॉलिड दलील
वीडी सतीशन को जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं में जबरदस्त समर्थन हासिल था. पार्टी के आंतरिक सर्वे में भी इसपर मुहर लगी थी. हालांकि, विधायक उनके पक्ष में नहीं थे लेकिन सतीशन ये समझाने में कामयाब रहे कि वेणुगोपाल संगठन महासचिव रहते अपने समर्थकों को ज्यादा टिकट दिलवा सके थे. उनको आर्थिक सहायता भी दिलवाई और जाहिर है वही जीत के आए हैं. इसलिए उनका समर्थन ज्यादा है. आलाकमान ने सतीशन की इस बात में दम पाया.
वीडी सतीशन को जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं में जबरदस्त समर्थन हासिल था. पार्टी के आंतरिक सर्वे में भी इसपर मुहर लगी थी. हालांकि, विधायक उनके पक्ष में नहीं थे लेकिन सतीशन ये समझाने में कामयाब रहे कि वेणुगोपाल संगठन महासचिव रहते अपने समर्थकों को ज्यादा टिकट दिलवा सके थे. उनको आर्थिक सहायता भी दिलवाई और जाहिर है वही जीत के आए हैं. इसलिए उनका समर्थन ज्यादा है. आलाकमान ने सतीशन की इस बात में दम पाया.
दूसरा कारण- पार्टी में टूट का खतरा
वीडी सतीशन न तो वेणुगोपाल को सीएम बनाने के पक्ष में थे, न ही उनके मातहत काम करने को तैयार. मतलब सतीशन वेणुगोपाल के मुख्यमंत्री के रूप में चुने जाने की सूरत में उनके साथ काम करने को तैयार नहीं थे. सतीशन ने साफ कर दिया था कि वो वेणुगोपाल के नाम को प्रपोज भी नहीं करेंगे. मतलब सतीशन किसी भी कीमत पर सीएम के पद से कम पर तैयार नहीं थे. जब तमाम कोशिशों के बाद भी सतीशन तैयार नहीं हुए तो राहुल गांधी को पार्टी की टूट का खतरा मंडराने लगा.

तीसरा- वेणु की राहुल से करीबी उनकी ताकत के बजाए कमजोरी बन गई!
कोई हल नहीं निकलता देख राहुल गांधी ने मल्लिकार्जुन खरगे से बुधवार शाम मुलाकात की. सभी पहलुओं पर चर्चा हुई. सतीशन के पक्ष में फैसला लेने से पहले वेणुगोपाल को मनाना जरूरी था. इसलिए ये जिम्मेदारी खरगे ने राहुल गांधी की सौंपी. राहुल गांधी ने वेणुगोपाल को गुरुवार सुबह अपने आवास पर बुलाया और उनसे दो घंटे की मैराथन बैठक की. इसक तरह वेणुगोपाल की सबसे बड़ी ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई. राहुल गांधी ने कहा कि आप संगठन महासचिव बने रहिए, आगे अध्यक्ष का भी चुनाव है. आप उसके लिए भी हमारी पसंद बन सकते हैं. आपके सामने बड़ा कैरियर है. फिलहाल पार्टी को एकजुट रखने के लिए आपको बलिदान देना पड़ेगा. जाहिर है वेणुगोपाल राहुल गांधी की बात नहीं टाल पाए और भारी मन से सतीशन के नाम पर सहमत हो गए.
चौथा कारण- एंटनी फैक्टर
चौथी सबसे बड़ी वजह रही राहुल गांधी की एंटनी से सलाह लेने का फैसला. राहुल गांधी ने सतीशन बनाम चेन्निथला बनाम वेणुगोपाल के दावे के बीच फंसे पेच को सुलझाने के लिए सोनिया गांधी के खास और अब राजनीति से संन्यास ले चुके ए के एंटनी से बात की. राहुल से एंटनी ने कहा कि आपको जनसमर्थन के साथ जाना चाहिए. जाहिर है एंटनी ने संकेत दिया कि भले ही वेणुगोपाल को ज्यादा विधायक समर्थन दे रहे हों लेकिन जमीन पर पिछले पांच साल लेफ्ट से लड़ने वाले सतीशन की छवि कार्यकर्ताओं और जनता में एक योद्धा की है लिहाजा उनको ही प्रदेश की कमान देनी चाहिए.
पांचवा कारण- IUML की सतीशन से दोस्ती और गांधी परिवार के वायनाड का पेच
आईयूएमएल (IUML) अंदरखाने सतीशन को समर्थन दे रहा था. IUML के बिना सरकार नहीं बन सकती थी. वेणुगोपाल के IUML से बहुत अच्छे रिश्ते नहीं थे. इसलिए भी सतीशन को इसका फायदा मिला. वायनाड भी गांधी परिवार के लिए कमजोर कड़ी साबित हुआ. IUML ने वायनाड सीट राहुल गांधी और उसके बाद प्रियंका के लिए खाली की थी. IUML का इस सीट पर दबदबा है. उन्होंने किसी विधायक को ही सीएम बनाने का समर्थन किया, इसलिए भी सतीशन के हक में फैसला हुआ.








