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संसद में दो-तिहाई बहुमत की जंग जीतने को BJP ने बनाया मास्टरप्लान, किसके के सहारे पार होगी नैया?

अबतक इंडिया न्यूज 18 जुलाई । संसद में महिला आरक्षण कानून और डिलिमिटेशन यानी परिसीमन विधेयक जैसे अहम संवैधानिक संशोधन पास कराने की तैयारी है. इसके लिलए केंद्र सरकार को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए. इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने महाराष्ट्र में नई राजनीतिक रणनीति बनाई है. जी हां, संसद में संख्या बल को बदलने के मकसद से भाजपा ने महाराष्ट्र की सियासत में एक बड़े संगठनात्मक बदलाव का प्रस्ताव रखा है. यह प्रस्ताव है एनसीपी का मर्जर.
जी हां, संसद में संख्या की कमी को पूरा करने के लिए भाजपा ने एक रणनीतिक योजना पेश की है. सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी चाहती है कि एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुट अपने मतभेद भुलाकर फिर से एक हो जाएं और एकजुट होकर एनडीए यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा बनें. अहम बात यह है कि बीजेपी नहीं चाहती कि एनसीपी का कोई भी गुट सीधे उसकी पार्टी में शामिल हो. इसके बजाय वह चाहती है कि एनसीपी अपनी अलग पहचान बनाए रखते हुए एनडीए की सहयोगी पार्टी बनी रहे. इसके पीछे कई राजनीतिक वजहें बताई जा रही हैं.
सीधा विलय रणनीतिक योजना के खिलाफ क्यों है?
सत्ताधारी पार्टी का फिर से एकजुट हुए गुट को अपने में मिलाने के बजाय एक स्वतंत्र सहयोगी के तौर पर बनाए रखने का फैसला चुनावी गणित को ध्यान में रखकर बहुत सोच-समझकर लिया गया है.
  1. जातिगत समीकरण: पहली वजह जातीय समीकरण है. महाराष्ट्र में बीजेपी का बड़ा वोट बैंक ओबीसी समुदायों पर आधारित है. भाजपा का मुख्य समर्थक आधार काफी हद तक ‘माधव’ सोशल समीकरण पर निर्भर रहा है. यह कुछ खास अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है. अगर एनसीपी का सीधा विलय बीजेपी में होता है तो इससे कुछ वोटरों के नाराज होने का खतरा हो सकता है. इसकी वजह है कि एनसीपी के दबदबे वाले मराठा वोट बैंक के साथ उनका पुराना राजनीतिक टकराव रहा है.

 

. सहयोगियों का भरोसा बनाए रखना: दूसरी वजह मौजूदा सहयोगी दलों का भरोसा बनाए रखना है. अगर NCP बीजेपी में शामिल हो जाती है, तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना जैसे सहयोगी दल असहज महसूस कर सकते हैं. इससे गठबंधन में स्थिरता बनी रहेगी.

 

3 . क्षेत्रीय पकड़ को अधिकतम करना: तीसरी वजह चुनावी रणनीति है. अलग-अलग इकाइयों के तौर पर काम करने से एनडीए एक ही समय में मतदाताओं के बहुत अलग-अलग वर्गों को आकर्षित कर सकता है, जिससे पूरे राज्य में उसकी मौजूदगी मजबूत होती है.

 

संसद के गणित पर नजर
इस पहल के पीछे मुख्य वजह संसद के भीतर का गणितीय समीकरण है. संविधान में संशोधन करने वाले किसी भी विधेयक को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है. ऐसे में पिछली कोशिशों से सबक लेते हुए बीजेपी अपने समर्थन का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रही है. अगर एनसीपी के दोनों गुट एक होकर एनडीए के साथ आते हैं, तो सरकार को संसद में अतिरिक्त सांसदों का समर्थन मिल सकता है. इससे महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम विधेयकों को पास कराने में मदद मिल सकती है.
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
हालांकि एनसीपी के दोनों गुटों को एक करना आसान नहीं होगा. सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व और सत्ता में हिस्सेदारी का है. दोनों पक्षों के नेता चाहते हैं कि उन्हें संगठन और सरकार में सम्मानजनक भूमिका मिले. फिलहाल बातचीत शुरुआती दौर में है, लेकिन माना जा रहा है कि केंद्र नेतृत्व इन मतभेदों को दूर कर दोनों गुटों को साथ लाने की कोशिश में जुटा हुआ है.

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