अबतक इंडिया न्यूज 20 जनवरी जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश के चार जिलों (भीलवाड़ा, बाडमेर, टोंक एवं सिरोही) के करीब 93 बजरी खनन पट्टों के ई-नीलामी आदेश रद्द कर दिए. साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को रिपोर्ट तैयार करने को कहा, जहां से बजरी निकाली जाएगी और वहां बजरी का पुनर्भरण कैसे होगा. अदालत ने कहा कि राज्य सरकार यह रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करे और चाहे तो मामले में सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका में इस रिपोर्ट को रखे. अदालत ने कहा कि नियम से एक बार खनन की अवधि पूरी होने के बाद वहां अगले पांच साल खनन नहीं होता है.
डॉ. बृजमोहन सपूत कला संस्कृति सेवा संस्थान की जनहित याचिका स्वीकार करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश दिए. अदालत ने पूर्व में सभी पक्षों की बहस सुनकर याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा था. जनहित याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता कमलाकर शर्मा और अधिवक्ता अलंकृता शर्मा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और केन्द्रीय एंपावरमेंट कमेटी की सिफारिश की अवहेलना करते हुए इन खनन पट्टों की ई-नीलामी निकाली.
जनहित याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने साल 2021 में सीईसी की रिपोर्ट को मंजूरी दी थी. इसमें स्पष्ट प्रावधान था कि एक बार खनन अवधि पूरी होने के बाद वहां अगले पांच साल के लिए खनन कार्य नहीं किया जाएगा. इससे इस अवधि में नदी में प्राकृतिक रूप से बजरी का पुनर्भरण हो सकेगा. इसके बावजूद राज्य सरकार ने 12 से 100 हेक्टेयर तक के छोटे ब्लॉक बनाकर पुराने खनन क्षेत्रों को फिर नीलाम कर दिया. ऐसे में एक खनन क्षेत्र में बीते एक दशक से बजरी खनन हो रहा है. याचिका में कहा कि इससे नदी का तल गहरा हो रहा है और भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है.नदी किनारे की जमीन बंजर हो रही है.
नदियों का पुनर्भरण नहीं हो रहा
याचिका में कहा गया कि प्रदेश में 12 मासी नदियां नहीं है. इससे मानसून में इनका पूरी तरह पुनर्भरण नहीं होता. अत्यधिक खनन से मछली पालन स्थल भी समाप्त हो रहे हैं. सुनवाई के दौरान अदालत ने तीन अधिकारियों की कमेटी बनाई थी, लेकिन कमेटी के गलत निष्कर्ष निकालने पर कोर्ट ने उसकी रिपोर्ट नहीं मानी.
जर्जर स्कूल इमारतों का उपयोग क्यों
उधर, राजस्थान हाईकोर्ट ने पाबंदी के बावजूद प्रदेश के जर्जर सरकारी स्कूल भवनों के उपयोग पर नाराजगी जताई. जस्टिस महेन्द्र गोयल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने कहा कि 2 फरवरी को प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा निदेशक अदालत में पेश हों. अदालत में शपथ पत्र देकर बताएं कि अदालती रोक के बावजूद जर्जर स्कूल भवनों का उपयोग कैसे किया जा रहा है.
कोर्ट ने पूछा कि हाल में बूंदी जिले में सरकारी स्कूल की छत किन परिस्थितियों में गिरी. खंडपीठ ने यह आदेश झालावाड़ में स्कूल की छत गिरने के बाद लिए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान पर सुनवाई करते हुए दिए. सुनवाई के दौरान न्यायमित्र ने एक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर का उल्लेख करते हुए बताया कि बूंदी के भैंसखेड के सरकारी स्कूल की छत गिरी है. स्कूल में तब करीब तीस विद्यार्थी थे. वे कुछ देर पहले ही बाहर बैठे थे. यदि अंदर होते तो बड़ी घटना हो सकती थी.
22 अगस्त की रोक प्रभावी क्यों नहीं
इस पर अदालत ने कहा कि विभाग के अधिकारी बार-बार आश्वासन दे रहे हैं कि छात्रों को सुरक्षित माहौल में पढ़ाई के लिए हरसंभव कार्रवाई की जा रही है, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है. अदालत ने 22 अगस्त को आदेश जारी कर जर्जर स्कूलों का उपयोग करने पर रोक लगाई थी. इस पर विभाग ने अदालत को आदेश की पालना करने की बात भी कही थी, लेकिन इसकी खुलेआम अवहेलना की जा रही है. इसके अलावा अदालत ने पूर्व में कई बिंदुओं पर दिए राज्य सरकार से शपथ पत्र मांगा था, लेकिन बीते कई महीनों से अदालत में न शपथ पत्र दिया जा रहा है और ना ही देरी का कारण बताया जा रहा है.








