अबतक इंडिया न्यूज 22 जनवरी । हर वर्ष माघ शुक्ल पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी का पर्व भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है. यह दिन ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है. बसंत पंचमी को न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से बल्कि ज्योतिषीय रूप से भी वर्ष की सबसे श्रेष्ठ और शुभ तिथियों में गिना जाता है. मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती. बसंत पंचमी के अवसर पर विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत, शिक्षा से जुड़े कार्य और अन्य शुभ संस्कार बिना किसी संकोच के संपन्न किए जा सकते हैं. इसी दिन मां सरस्वती की पूजा-अर्चना कर भक्त विद्या, बुद्धि, विज्ञान, संगीत, कला और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. इस दौरान मां सरस्वती की विधिवत पूजा करने से विद्यार्थियों, कलाकारों और ज्ञान साधकों को विशेष लाभ मिलेगा.सही तिथि और शुभ मुहूर्त में पूजा कर माँ सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करना अत्यंत फलदायी माना गया है.
ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि इस साल यानी 2026 में बसंत पंचमी के दिन शिववास और उतराभाद्र पद नक्षत्र भी रहने वाला है. जिस वजह से बसंत पंचमी की तिथि का महत्व दोगुना हो जाता है.
- बसंत पंचमी पर स्वच्छ होकर सबसे पहले पूजा घर में एक लकड़ी की चौकी रखें। उस पर पीले रंग का वस्त्र बिछाएं और मां सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें फिर, माता सरस्वती का आचमन करके स्नान कराएं। इसके बाद, देवी को फूल माला आदि अर्पित करें।
- मां सरस्वती को सिंदूर, अक्षत आदि और श्रृंगार का सामान भी अर्पित करें। बसंत पंचमी के दिन माता के चरणों में गुलाल जरूर लगाना चाहिए।
- फिर, सरस्वती माता को वस्त्र पहनाकर विधि-विधान से पूजा अर्चना करें और उन्हें पकवानों, मिठाई, फल आदि का भोग लगाएं।
- बसंत पंचमी के दिन पुस्तक, कॉपी आदि की भी पूजा करना चाहिए और जरूरतमंदों को पढ़ाई का सामान दान करें।
- माता सरस्वती और भगवान गणेश की पूजा करने के पश्चात सभी को प्रसाद बांटे। शाम के समय भी देवी सरस्वती की विधि विधान से पूजा अवश्य करनी चाहिए।
बसंत पंचमी पर कलश पजून विधि
- सरस्वती पूजा के दिन कलश पर मोली बांधकर उसके ऊपर आम के पत्ते रखें। इसके बाद, कलश में दूर्वा, सुपारी, अक्षत और मुद्रा डालें।
- कलश के गले पर मोली लपेटकर नारियल को कलश पर रख दें। अब अपने हाथ में कुछ अक्षत लेकर वरुण देवता का कलश में आव्हान करें- ‘ओम त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:, अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।)’








