अबतक इंडिया न्यूज जयपुर 1 फरवरी । देश में भ्रष्टाचार की बात आते ही उंगली नेताओं और अफसरों पर उठती है, लेकिन हम आपको दिखाएंगे वो आईना, जिसमें आम आदमी खुद कटघरे में खड़ा है. ऐसे अमीरों की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गरीब बनकर हाथ में राशनकार्ड लेकर लाइनों में लगकर फ्री का गेहूं डकारते रहे. ये ऐसा घोटाला है जिसमें कोई जेल नहीं गया. कोई अफसर सस्पेंड नहीं हुआ, लेकिन लूट सबसे बड़ी हुई.
ये कहानी है उन ‘फर्जी गरीबों’ की, जो एसी में बैठकर गरीबों का राशन खा रहे थे. जिनके पास गाड़ियां थीं, कंपनियां थीं, इनकम टैक्स और जीएसटी नंबर थे, लेकिन हाथ में गरीब का राशन कार्ड था और इनका पेट भरता रहा. जबकि असली गरीब की थाली खाली होती रही. राजस्थान सरकार के ‘गिव अप’ अभियान ने इस नकाब को उतार दिया है और 81 लाख लोग फ्री का अनाज लेने की लालच में लाखों लोग खुद फर्जी गरीब बन बैठे.
2 अक्टूबर 2013 को खाद्य सुरक्षा योजना की शुरुआत हुई, लेकिन इस योजना में राजस्थान में भ्रष्टाचार सिर्फ फाइलों या टेबल तक सीमित नहीं निकला, बल्कि गरीब की थाली तक पहुंच गया. राज्य सरकार के ‘गिव अप’ अभियान ने यह साबित कर दिया कि फ्री गेहूं की लाइन में सिर्फ गरीब ही नहीं, बल्कि लाखों संपन्न लोग भी खड़े थे. नवंबर 2024 से शुरू हुए गिव अप अभियान में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना (NFSA) की 4 करोड़ 35 लाख यूनिट्स की जांच हुई.
इसमें से 54 लाख 36 हजार यूनिट्स, यानी 12.5 प्रतिशत ऐसे लोग निकले जो पात्र नहीं थे. फिर भी हर महीने सरकारी गेहूं उठा रहे थे. ये वही लोग हैं जिनके पास कारोबार है, जो टैक्स देते हैं, जिनके नाम गाड़ियां हैं या जो किसी कंपनी के डायरेक्टर हैं, लेकिन फिर भी सालों से गरीबों का अनाज उठाते रहे. जब केंद्र सरकार के इनकम टैक्स, जीएसटी और वाहन रजिस्ट्रेशन जैसे डाटाबेस से मिलान हुआ और वसूली के नोटिस जाने लगे, तब जाकर यह गरीबी का मुखौटा उतरना शुरू हुआ.
सख्ती का असर ये हुआ की इन लोगों ने खुद ही योजना छोड़ दी. इसके साथ ही सरकार ने ई-केवाईसी लंबित खातों को भी खंगाला. तीन महीने से ज्यादा समय से अटके 27 लाख यूनिट्स हटाई गईं. इस तरह कुल मिलाकर 81 लाख 36 हजार यूनिट्स, यानी 18.6 प्रतिशत लाभार्थी सूची से बाहर हो गए. यह कहानी सिर्फ नेताओं या अफसरों की बेईमानी की नहीं है. यह उस साइलेंट करप्शन की भी है जो सालों से सिस्टम के भीतर आम लोगों की चुप भागीदारी से चलता रहा.
खाद्य विभाग के अनुसार 26 जनवरी 2025 को खाद्य सुरक्षा पोर्टल फिर शुरू हुआ और अब तक 73 लाख नए गरीब पात्र योजना से जोड़े जा चुके हैं. यह संख्या हटाए गए अमीरों का लगभग 90 प्रतिशत है. इन 73 लाख में 29 लाख नए परिवार सदस्य हैं. 11.49 लाख वे लोग हैं जिन्होंने 2022 में आवेदन किया था लेकिन अब जाकर उन्हें हक मिला और 31.34 लाख लोग वे हैं जो नए पोर्टल से जुड़े.
यानि जिन लोगों के लिए यह योजना बनी थी. वहीं अब वापस आ रहे हैं. फिर भी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है. आज भी NFSA में करीब 11 लाख सीटें खाली हैं. इसका मतलब है कि करीब 2.5 प्रतिशत और गरीब परिवार अभी भी गेहूं के इंतजार में हैं. जयपुर जिला सबसे आगे है, जहां 3.17 लाख पात्र लोगों को योजना से जोड़ा गया. इसके बाद बाड़मेर में 3.07 लाख और सीकर में 3.04 लाख नए नाम जुड़े. आज राजस्थान देश का इकलौता राज्य बन गया है, जहां खाद्य सुरक्षा सूची में नाम जोड़ने के लिए वैक्यूम हैं और लगातार पात्र लाभार्थियों के नाम जोड़े जा रहे हैं.
बहरहाल, फूड डिपार्टमेंट इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रहा है कि वह देश का अकेला राज्य है, जहां इतने बड़े पैमाने पर सफाई कर खाद्य सुरक्षा सूची को “शुद्ध” किया गया है, लेकिन असली सवाल यह है कि अगर ‘गिव अप’ अभियान न चलता तो क्या यह लूट यूं ही चलती रहती. सवाल यह भी उठता है कि अगर सरकार के पास आयकर, जीएसटी, गाड़ियों और कंपनियों के डाटाबेस पहले से थे, तो ये लोग इतने साल तक सिस्टम को कैसे चकमा देते रहे. क्या यह सिर्फ तकनीकी चूक थी या जानबूझकर आंख मूंदे जाने का मामला है.








