अबतक इंडिया न्यूज 22 दिसंबर देशनोक । देशनोक का नवनिर्मित प्रमुख सीवरेज नाला जो स्थानीय ओछी राजनीति व प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया।पूरे देशनोक की प्रमुख समस्या प्रमुख मार्ग पर जमा होनेवाला कीचड़ हैं।इस समस्या से पिछले कई वर्षों से पूरा कस्बा त्रस्त हैं।जनसख्या के लिहाज से देशनोक भले ही एक छोटा कस्बा हो लेकिन अस्तित्व व महत्ता की दृष्टिकोण से देशनोक विश्वस्तरीय धार्मिक नगरी हैं।क्योंकि देशनोक विश्व विख्यात मां करणी का पावन धाम हैं।विश्व भर से भक्त अटूट श्रद्धा व आस्था के साथ मां करणी के दर्शन करने आते हैं। देशनोक हमेशा मां करणी द्वारा स्थापित सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण रहा हैं।
लेकिन पिछले चार/पांच वर्षों से एक निम्न स्तरीय मानसिकता से ग्रसित राजनेता की घटिया राजनीति की भेंट चढ़ रहा हैं।जो देशनोक की सदियों पुरानी स्थापित परंपरा के कतई अनुकूल नहीं है।राजनीति व चुनाव तो पहले भी होते थे ,लेकिन उसमें नैतिकता थी जो अब विलुप्त होने लगी हैं।यह स्थानीय सामाजिक समरसता के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
एक नाला जिसने खोल दी ढोंगियों की पोल
करणी माता मंदिर को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग जो अब कीचड़ मार्ग के नाम से देशनोकवासियों के जेहन में घर कर चुका हैं।इस कीचड़ मार्ग पर इंसानियत को शर्मसार करने वाले कई दृश्य आज भी लोगो के मानस पटल पर जीवंत हैं।खासकर उनके मानस पटल पर जिनको अपनो की अंतिम यात्रा के साथ इस कीचड़ से होकर गुजरना पड़ा।फिर भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों व प्रशासन को तनिक भी शर्म नहीं आई।“शर्म” तो जैसे उनके शब्दकोश में है ही नहीं। केवल किसी एक राजीनीति दल के नहीं दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के माननीय पार्षद व पदाधिकारी बराबर दोषी हैं।ओछी निजी स्वार्थपूर्ण राजनीति व निजी हित के अलावा उन्हें देशनोक की आम जनता का हित कभी नजर ही नहीं आया।क्षेत्रीय सांसद व विधायक गुट का तथाकथित ठेकेदार बनकर ढिंढोरा पीटनेवाले ये तमाम बेशर्म ,निठल्ले,फिर से चुनाव में उतरने की जुगत में हैं।लेकिन ये सब भूल जाते है कि लोकतंत्र में जनता माई-बाप होती हैं।
श्रेय लेने व बिगाड़ने की होड़ में बिगाड़ी नाले की गुणवत्ता
नाले की चौड़ाई दो फुट व चार फुट के मुद्दे को ‘नाक का सवाल’ बनाकर निशुल्क व सशुल्क ओछी राजीनीति के घिनौना खेल में एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी बनकर जनहित को दरकिनार कर ” डर्टी पॉलिटिक्स” के चैंपियन बनने की ओर तेजी से निकल पड़े। जनता जो “गणेश” होती उसे “गोबर” समझने की अक्षम्य भूल कर बैठे।जनता की खून-पसीने के जनधन के 87 लाख रुपए से बनने वाले समस्या निदान नाले की मिट्टीपलित कर बैठे।जनता के सेवक खुद को जनता का मालिक समझकर तथाकथित अपने चंद वोटरों की खुशामदीद में बलि के बकरे बन गए।इन्ही ‘चंद ‘ की खुशामदीद में पूरे कस्बे की समस्या को जस की तस रखने के बेशर्मी की सारी हदें लांघ दी। नाले की गुणवत्ता व स्वरूप बिगाड़ने के लिए पर्दे के पीछे बैठे आका के इशारे पर कहीं क्षेत्रीय विधायक द्वारा एमएलए लैड से बनने वाले नाले का श्रेय किसी भी सूरत विधायक को न मिल जाए।इसी मंशा के कारण जनहित व नैतिकता की सारी हदें पार कर गए।
PWD के अधिकारी भी कम दोषी नहीं हैं
नाला निर्माण के दौरान कईबार राजनीतिक व जन शिकायतें हुई।PWD के अधिकारी मौके पर आए।कनिष्ठ अभियंता से अधिशाषी अभियंता तक आए।लेकिन सटीक व उचित समाधान के इतर केवल औपचारिकता तक ही सीमित रहे।नाले के दोनों ही ठेकेदारों को गुणवत्तापूर्ण तकनीकी मापदंडों के अनुरूप निर्माण के लिए पाबंद करने में सफल नहीं हुए।औपचारिकता जिम्मेदारी का मानक नहीं हो सकता। न पाइपों का मिलान सही हुआ न ही लेवल के लिए विभागीय गाइड लाइन की पालना हुई।फिर मौके पर पहुंचकर जमीनी स्तर के अनुरूप समस्या निस्तारण के इतर केवल औपचारिक “औचक निरीक्षण” के क्या मतलब ? ठेकेदारों को फटकार लगाने या फिर आंशिक भुगतान मात्र रोकने से क्या होगा।और हुआ भी नही।फिर इस जनधन के नुकसान की भरपाई कौन करेगा ?लगभग दो महीने तक निर्माण के नाम पर विद्यार्थी,मरीज,बुजुर्ग,महिला सहित कस्बे की बड़ी आबादी ने जो तकलीफें सहन की उसका क्या ?कभी पानी की सप्लाई बंद कभी बिजली बंद….किसकी लापरवाही मानी जायेगी..? क्या जवाबदेही तय होगी..?








